शहडोल जिले के पचड़ी और खमरिया कला गांवों में धान के कुछ खेतों में सफेद माहू का प्रकोप मिला है। कृषि विज्ञान केंद्र और कृषि विभाग की संयुक्त टीम ने 21 सितंबर को खेतों का भ्रमण कर किसानों को कीट-रोग पहचानने और समय पर नियंत्रण के तरीके बताए।
अधिक नमी में बढ़ सकता है सफेद माहू
कृषि वैज्ञानिक डॉ. ब्रजकिशोर प्रजापति के अनुसार जिले में धान पर सफेद माहू, तना छेदक, तना गलन और शीथ ब्लाइट का असर देखा जा रहा है। वातावरण में अधिक आर्द्रता हॉपर यानी माहू के लिए अनुकूल बताई गई है।
सफेद माहू के शिशु और प्रौढ़ धान के तने से रस चूसते हैं। इससे पत्तियां गोल घेरे में पीली या भूरी होकर मुरझाने लगती हैं, जिसे हॉपर बर्न कहा जाता है; समय पर रोकथाम न होने पर 10 से 60 प्रतिशत तक नुकसान हो सकता है।
किसानों को फसल अवशेष और खरपतवार नष्ट करने तथा प्रकोप बढ़ने पर खेत से पानी निकालने की सलाह दी गई। शुरुआती नियंत्रण के लिए गौमूत्र और स्थानीय वनस्पतियों से तैयार घोल तथा 1500 पीपीएम एजाडिरेक्टिन की 5 मिलीलीटर प्रति लीटर मात्रा में हींग मिलाकर छिड़काव का तरीका बताया गया।
अधिक प्रकोप की स्थिति में पाइमेट्रोजीन 50 प्रतिशत डब्ल्यूजी 120 ग्राम, थायोमिथोक्सोम 25 प्रतिशत 40 ग्राम या बुप्रोफेजिन 25 प्रतिशत एसएल 350 मिलीलीटर प्रति एकड़ के हिसाब से छिड़काव की सलाह दी गई। दवा तनों तक पहुंचाने के लिए पहले बांस की सहायता से पौधों के बीच रास्ता बनाने को कहा गया।
पत्ती लपेटक और सोयाबीन मोजेक की भी पहचान बताई
विशेषज्ञों ने बताया कि पत्ती लपेटक की सूंडी कोमल पत्तियों को लपेटकर भीतर से खाती है, जिससे पत्तियों का रंग उड़ता है और सिरा सूखने लगता है। इसके नियंत्रण के लिए लाइट ट्रैप, नीम तेल और निर्धारित कीटनाशकों के साथ ट्राइकोग्रामा काइलोनिस के प्रयोग की जानकारी दी गई।
सहायक संचालक कृषि रमेन्द्र सिंह ने टमाटर और बैंगन के फल छेदक से बचाव के उपाय भी बताए। सोयाबीन मोजेक को सफेद मक्खी से फैलने वाला रोग बताते हुए शुरुआती अवस्था में संक्रमित पौधे खेत से निकालने और नीम तेल के घोल के छिड़काव की सलाह दी गई।
दवा छिड़कते समय सुरक्षा पर जोर
रेखा अहिरवार और भावना मिश्रा ने किसानों से छिड़काव के दौरान दस्ताने, मास्क, चश्मा, एप्रन और गमबूट पहनने को कहा। घोल साफ पानी में लकड़ी की छड़ी से बनाने, सुबह या देर शाम छिड़काव करने और बंद नोजल को मुंह से न फूंकने की हिदायत भी दी गई।

